Embroidery

admin August 21, 2017 No Comments

Embroidery

कढ़ाई

कला  की  कोई सीमा  नहीं होती  इसीलिए  आज  लोग  किसी  भी क्षेत्र  में  माहिर  हों सकते  हैं ! अपनी  कला  का  प्रदर्शन  करने  का  एक  और  सशक्त  माध्यम  हैं-कढ़ाई जिसे कशीदाकारी भी कहा  जाता  हें! और  अंग्रेजी  में  एम्ब्रोइडरी  (Embroidery) कहते  हैं! भारत  में  जितने  प्रदेश हैं  उन  सभी  राज्यो  में  कढ़ाई  करी  जाती  हैं ! कपड़ें  पर की  जाने  वाली  कढ़ाई  बहुत  बारीकी  का तथा मेहनत का काम  हैं! इसे आसान काम भी नहीं कहते ओर जो कढ़ाई करने में निपुण हैं उसके लिए तो यह एक शौक भी बन सकता हैं या व्यवसाय भी बनाया जा सकता हैं! यही वजह हैं कि कुछ प्रदेशों की कढ़ाई सुप्रसिद्ध हैं! जिनके नाम कुछ इस प्रकार है

 कंठा कशीदाकारी

कंठा एक कशीदाकारी है जो मुख्यतः पश्चिम बंगाल में लोकप्रिय है। कंठा का उपयोग बंगाल में महिलाओं द्वारा पहनी जाने वाली पारम्परिक ” कंठा  साड़ियों” में किया जाता है।यह कढ़ाई ज्यादातर सोफे ओर पलंग के तकिए पर की जाती हैं! यहाँ तक कि रजाई पर होने वाली कढ़ाई को नक्शी  कंठा  कहा जाता हैं! यह कशीदाकारी बंगाल के गॉव की औरतें करती हुई दिखती हैं! यह कढ़ाई केवल सूई से कोने में साधारण धोती या साडी पर की जाती हैं! सूई को कपडे के किनारे-किनारे सिलकर इस कशीदाकारी को किया जाता हैं! कपडे पर सिलने से एक अलग तरह का लहरदार(wavy effect) प्रभाव पड़ता हैं! यह कढ़ाई दुप्पट्टा, कमीज़, चादर पर होती हैं जो उसे आकर्षक बनाती हैं! सूती या सिल्क कपड़े पर ही कशीदाकारी की जाती हैं! कंठा का एक ओर अर्थ होता हैं गला (“throat”) अर्थात यह कढ़ाई कंठ के आसपास वाली जगह पर होती हैं जो उस कपड़े को अनूठा बनाकर पहनने लायक बनाती हैं! बंगाल में घूमने आए यात्रियों के बीच यह कशीदाकारी बेहद प्रसिद्ध हैं!

 

फुलकारी 

‘फुलकारी  एक तरह की कढाई होती है जो चुनरी /दुपटो पर हाथों से की जाती है। फुलकारी शब्द “फूल” और “कारी” से बना है जिसका मतलब फूलों की कलाकारी। पुराने समय में बचपन में ही लड़कियां इस कला को सीख लेती थी और अपनी शादी के लिए दहेज बनाने लगती थी। यह लड़की की शख्सियत की कला का प्रतीक मानी जाती थी। इसका प्रयोग शादी और त्यौहार, शगुनों के समय, लोक दाज में लड़किओं को फुलकारियां के बाग़ देते थे।, लांवा फेरे लेने के समय पिता अपनी कन्या को इसी कढ़ाई से बना दुपट्टा देते हैं! यह लुधियाना, अमृतसर, जालंधर, रोहतक, फरीदकोट ओर कपूरथला ओर पंजाब तथा हरियाणा के काफी शहरों में प्रसिद्ध हैं! इसी कढ़ाई का एक ओर रूप हैं कालाबातुन (kalabatun) जो सोने की तारो से लाल ओर नारंगी रंग के कपड़े पर की जाती हैं! पैचवर्क भी इसी कढ़ाई की पुरानी परम्परा हैं जो पंजाब के शहरों ओर अमृतसर में बहुत प्रसिद्ध हैं!

शीशा या मिरर वर्क (Mirror work) कढ़ाई

तेरहवी शताब्दी से प्रचलित हुई यह कढ़ाई गुजरात ओर राजस्थान में तो प्रसिद्ध हैं ही साथ ही अब एशिया के विभिन देश जैसे अब पाकिस्तान, बांग्लादेश, चीन ओर अफ़ग़ानिस्तान में भी अच्छी खासी मशहूर हैं! इसे अभला भारत,(abhla bhara); भी कहा जाता हैं! मिक्का(mica) के टुकडो को शीशे के तौर पर प्रयोग में लाया जाता हैं! बाद में ग्लास (glass) के टुकड़े भी शीशे की तरह प्रयोग में आने लगे! आजकल यह शीशा कढ़ाई वाल हैंगिंग(wall hanging) , तकिए के कवर महिलाओ की साडी ओर सलवार-कमीज़ पर बॉर्डर के रूप में करी जाती हैं! इसी कढ़ाई में चिकन वर्क भी होता हैं वो भी विभिन प्रकार का हैं जैसे तप्ची(Taipchi), बखिया( Bakhia), फुंडा(Phunda), मुर्री(Murri), जाली(Jaal)i, हथककटी(Hathkati), पेचनी(Pechni), घसपत्ति(Ghas Patti), चानपत्ति( Chaana Patti)  पहले यह कढ़ाई हाथ से की जाती थी अब मशीन से करी जाती हैं!

चंबा रुमाल कढ़ाई

हिमाचल प्रदेश का चंबा राज्य द्वारा बनाया गया रुमाल पूरे भारत में प्रसिद्ध हैं! यह कढ़ाई रुमाल ओर तकिए के कवर पर की जाती हैं! शादी-ब्याह में भी तोहफे के तौर पर मेहमानों को दिया जाता हैं! ऐसा कहा जाता हैं कि गुरु नानक जी की बहन ने भी चम्बा रुमाल उन्हें दिया था जो आज भी होशियारपुर के गुरुद्वारे में संभाल कर रखा गया हैं! यह रुमाल गोल, चौड़े, या अलग तरह के आकार में काढ़े जाते हैं! यह कढ़ाई सिल्क के धागे से करी जाती हैं! जो बंगाल ओर पाकिस्तान के सियालकोट शहर से मंगवाया जाता हैं! इस कढ़ाई के लिए बारीक़ सूई का प्रयोग किया जाता हैं! इस कढ़ाई के करने के तरीके को दोहरा टांका कहा जाता हैं! इसके पैटर्न (pattern) इतने शानदार होते हैं की दस फीट की दूरी से भी नज़र आ जाते  हैं! दोहरा टांका तरीका कश्मीर की देन हैं! आजकल चंबा रुमाल गोला, त्रिकोण, वर्ग ओर आयत (square and rectangular shapes) में बनाए जाते हैं! इस बनाने में खदर, चारकोल, सिल्क या ब्रश का प्रयोग होता हैं! कढ़ाई के लिए डबल साटन स्टिच (double satin stitch) का इस्तेमाल होता हैं! आगे-पीछे दोनों तरफ कढ़ाई करके कपड़े के किनारे को दो चार इंच सिल दिया जाता हैं!  इस तरह  की शानदार कढ़ाई की वजह से आज इसके सोलह तरह के डिज़ाइन बाज़ार में उपलब्ध हैं!

काठी (Kathi)

काठी कढ़ाई गुजरात की सबसे प्रसिद्ध कढ़ाई हैं! इस कढ़ाई को काठी गाय चराने वाले जो एक तरह की गाय चराने वालो की प्रजाति हैं ने खोजा था ओर वो ही इसे प्रयोग में लाये थे! इस तरह की कढ़ाई में चैन स्टिच (chain stitch) अप्प्लीकुए वर्क (appliqué work) ओर शीशा लगाया जाता हैं (mirror-like insertions). साधारण कढ़ाई हर वर्ग के लोगो को पसंद आती हैं!

मुकेश (Mukesh)

मुकेश ऎसी कढ़ाई हैं जिसमे धातु को दबाकर उसे कपड़े के धागे से लपेट दिया जाता हैं! मुकेश कार्य को  बदला (Badla) या फरदी(phardi) कहा जाता हैं!  महिलाएं इस चमकदार कढ़ाई या चिकन कढ़ाई (जो इसी कढ़ाई का एक रूप हैं )को करने के लिए लम्बी सूई का प्रयोग कर रही होती हैं!

गोटा (Gota)

गोटा कढ़ाई जयपुर में करी जाती हैं! ज़री रिबन के छोटे टुकड़े किनारे पर लगाए जाते हैं! साडी के किनारे पर गोटा लगाया जाता हैं! गोटे से पक्षी, पशु ओर जानवर के टुकड़े काटकर सिले जाते हैं ताकि साडी को आकर्षक बनाया जा सकता हैं! मुस्लिम समाज इसे किनारी की तरह अपने परिधान पर इस्तेमाल करता हैं!

 

 

Tags :